लखनऊ। 25 जून 1975 की वह काली रात भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे विवादित अध्याय मानी जाती है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश में आपातकाल लागू किए जाने के साथ ही सरकार के विरोध में आवाज उठाने वाले हजारों लोगों को रातोंरात गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया। पूरे 21 महीने तक चले इस दौर में लोकतंत्र की आवाज को दबाने के लिए अनेक लोगों ने अमानवीय यातनाएं झेलीं।
राजधानी में आज भी 150 से अधिक लोकतंत्र सेनानी ऐसे हैं, जिन्होंने आपातकाल के दौरान जेल की कठिनाइयों और पुलिसिया अत्याचारों को सहा। इनके अलावा हजारों परिवार ऐसे हैं, जिनकी जिंदगी इस दौर में पूरी तरह बदल गई। 12 वर्ष के बालक से लेकर 80 वर्ष तक के बुजुर्ग भी इस दमन का शिकार बने।
शाहगंज निवासी लोकतंत्र सेनानी धनराज कर्मचंदानी बताते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े होने के कारण आपातकाल घोषित होते ही उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। उस समय उनकी पत्नी गर्भवती थीं और परिवार में कोई दूसरा कमाने वाला नहीं था। जेल में उनके साथ मारपीट की गई और अमानवीय व्यवहार किया गया। साथी लोकतंत्र सेनानियों ने उनके समर्थन में भूख हड़ताल भी की। वे बताते हैं कि पुलिस की बेरहमी इतनी थी कि मारपीट के साथ नाखून तक उखाड़ दिए जाते थे।
लोकतंत्र सेनानी विजय गोयल बताते हैं कि उनके साथ उनके छोटे भाई संजय गोयल को भी गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। उस समय संजय सेंट जॉन्स इंटर कॉलेज में सातवीं कक्षा के छात्र थे और उनकी उम्र मात्र 12 वर्ष थी। उन्हें करीब डेढ़ महीने तक जेल में रखा गया। इतनी कम उम्र में जेल जाने वाले वे सबसे कम आयु के आंदोलनकारियों में शामिल थे। उन्होंने अपनी परीक्षा भी जेल से ही दी थी।
लोकतंत्र सेनानियों का कहना है कि आपातकाल का वह दौर केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दिया गया एक बड़ा बलिदान था। आधी सदी बाद भी उस दौर की यातनाएं और संघर्ष उनकी स्मृतियों में आज भी उतने ही जीवंत हैं।

